DAMAN WELFARE SOCIETY

 

Dowry Act Misuse Abolition Network, acts as a catalyst to bring changes in the lives of millions of men and to save them from being trapped with false cases of Dowry Demands and other Laws.

The group also associates men who are fighting the cases against those women, unfortunately whom, they love the most.

People may consider this to be an anti-feminist organization, but to them, let me remind- No Society, be it of humans or animals, is complete without both the genders. It’s our moral responsibility to give respect to both the genders and provide equal rights to all.

It’s a shame for us as humans to talk about a country where we have cells and ministries for all-children, women and animals, but not for men.

This is a group formulated not only to help men but also to educate more and more families including women and matured girls to understand the basic concept of family and its structure, to bring harmony in family and to make women realize that the family you enter after marriage is more of yours than for anyone else. Matters do arise even between brothers, sisters, parents, neighbors, and where not. But then why family matters of husband-wife only, becomes so serious?

The basic reason for conflicts is ‘Misunderstanding’. Instead of mitigating this and establishing trust, faith and respect between a couple, most of the people misguide especially to women due to these gender-biased laws.

We are not a child. We need to understand this. Life is one. Instead of enjoying, we are fighting. I can’t believe and understand any one finding fun in fighting in courts, especially when false cases are being formulated, the hope of revival collapses, but the war continues.

So, women, please!!! Wake up your senses. Show that you have brains by doing constructive and binding work and not getting influenced by these laws and spoiling yourself and your dear ones.

We are definitely, here to support men being trapped in false cases and will surely oppose those men who are not humans. But we also oppose the misuse of laws and will definitely object to them who misuse these laws.

This organization is for not for you if you ever imagine showing the fun of being a woman by harassing your husbands and in-laws by misusing these laws. It's for you only if you are like “Parvati” and not “Dakshsuta”.

From the chairperson TeamDaman "I had the idea for a long time to set up this organization, but I didn't know how to go about it. There was (and still is) definitely a need for people to receive information and help. I had different businesses before, but I couldn't do anything else; now - this is my child."

My sincere thanks to SIF, Pati Pariwar, Bhavya, GHRS and others.

Let this candle give light to all families and let families stay Families.

No Fire is Small or Big. It starts with a very little spark before it becomes a Catastrophe... So are we...

 

 

 

 

OUR DEMANDS

“देश की बागडोर एवं विकास से सम्बन्ध रखने वाले प्रत्येक व्यक्ति के वास्ते“

“दामन वेलफेयर सोसाइटी (रजि० ) का उद्देश्य एवं मांग हेतु प्रार्थना पत्र”

श्रीमान जी,
    मुझे ये बताते हुए बहुत ही खेद होता है कि एक ओर जहां महिला को गंगा की तरह पवित्र मान कर हर क़ानून उनके पक्ष में ही बनते चले जा रहे हैं , वही पुरुषों को एक जानवर से भी बुरी तरह समझा जाने लगा है | इस देश में जहां महिला के बयान मात्र पर एक पुरुष को कड़े दंड का प्रावधान है , वही दूसरी तरफ महिलाओं द्वारा क़ानून के दुरूपयोग से किसी को पहुंची क्षति की भरपाई का कोई प्रावधान नहीं है | ऐसे में न सिर्फ महिलाओं में कानून का डर ख़त्म होता जा रहा है बल्कि उनके संरक्षण के लिए बने कानूनों के दुरूपयोग की प्रवत्ति बढती ही जा रही है | उदहारण के तौर पर दहेज़ प्रथा का कानून (धारा 498A I.P.C.) को ही ले लीजिये| इस क़ानून का इतना बेजा इस्तेमाल हुआ कि माननीय सर्वोच्च न्यायलय को भी इसे “कानूनी आतंकवाद” की संज्ञा देनी पड़ गयी| आपको जानकार आश्चर्य होगा की इसका 98 % तक दुरूपयोग ही हो रहा है|

घरेलु हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005, भी इसी तरह से दुरूपयोग की बलि चढ़ गया , जिसके चलते न जाने कितने परिवार टूट गए |

125 CrPC (MAINTENANCE), सेक्शन 24 HMA , घरेलु हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम 2005 और भविष्य में आने वाला तलाक़ का नया प्रावधान “Irretrievable Breakdown of Marriage Bill(IrBM)- 2010” आदि जहां एक ओर महिलाओं को सशक्त करते जा रहे है वही अच्छे अच्छे पद पर बैठी महिलाए इसका सिर्फ दुरूपयोग ही कर रही है |

इसका आंकलन नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के जारी किये गए सिर्फ 2 वर्षों के आंकड़ो से ही लगाया जा सकता है | 2012 में 46,992 महिलाओं की तुलना में 88,453 पुरुषों ने आत्महत्या की जबकि 2011 में 47,746 महिलाओं की तुलना में 87,839 पुरुषों ने आत्महत्या की | देखने योग्य बात ये है की महिलाओं की तुलना में लगभग दो-गुना पुरुषों को सुसाइड करने के लिए मजबूर होना पढ़ रहा है और २०११ से २०१२ में महिलाओं के सुसाइड में तो गिरावट आई किन्तु पुरुषो के सुसाइड की संख्या बढ़ गयी है |

इसके बाद भी यह कहना की सिर्फ महिलाओं पर अत्याचार हो रहा है, ये कहाँ का न्याय है? पुरुषों को दरिंदा समझने वाली मानसिकता को बदलना बहुत आवश्यक है | वरना ये आंकड़े और दुखद ही होते जायेंगे |

इस देश में जहां पेड़ पौधों के लिए मंत्रालय है, जानवरों की सुरक्षा के लिए मंत्रालय है , महिलाओं एवं बच्चों के लिए मंत्रालय है वही 80 प्रतिशत से ज्यादा टैक्स देने वाली प्रजाति अर्थात “पुरुष” की सुरक्षा के लिए कोई प्रावधान नहीं है |

इस सोच और आशा के साथ कि - समाज का पुरुषों को जानवर से भी बद्द्तर समजने वाली सोच में बदलाव लाना बहुत ही आवश्यक हो गया है , हमने दामन वेलफेयर सोसाइटी का निर्माण किया है | हमें ये कहते हुए अत्यंत ख़ुशी भी है कि न सिर्फ समाज के लोगों ने इस संस्था का प्रोत्साहन किया बल्कि समाज को आईना दिखाने वाली “मीडिया” ने भी बहुत अभिनन्दन के साथ पुरुषों की समस्या एवं मांग को समय-समय पर प्रकाशित भी किया |

इसी सन्दर्भ में आपसे हम अपनी संस्था के तहत कुछ मांग रखना जरूरी समझते है और आशा करते हैं कि इन बिन्दुओं पर गौर फरमाते हुए आप जल्द ही न्यायपालिका, कार्यपालिका, शाशन एवं प्रशाशन में कुछ फेर बदल करते हुए एक निष्पक्ष समाज के गठन हेतु हमारी इस मांग को पूर्ण रूप से मोहर लगायेंगे |

दामन वेलफेयर सोसाइटी आपसे निम्न बिन्दुओ पर ऐतिहासिक कदम उठाने हेतु मांग करता है कि -

1. “पुरुष आयोग का गठन” :- महिला आयोग की तर्ज पर पुरुषों की आवाज़ सुनने के लिए पुरुष आयोग का गठन किया जाए , जहां पुरुषों की समस्याओं के समाधान हेतु प्रावधान, उनके आये दिन की समस्या के कारणों का निवारण, उनके ऊपर बीतने वाली आपबीती समस्याओं को सुनने का मंच और कानूनी संरक्षण के प्रावधान हो | मौजूदा हालात में पुरुष बहुत मुसीबतों में होते हुए भी किसी को अपनी समस्या नहीं बता पाता |

2. “घरेलु हिंसा, 498A IPC , 376(रेप) आदि धाराओं में संशोधन” :- मौजूदा हालात में दहेज़ क़ानून, घरेलु हिंसा , गुजारा भत्ता , आदि कानूनों का बेजा इस्तेमाल हो रहा है | इनके रोकथाम के लिए जरूरी कदम जिसमे इन कानूनों के दुरूपयोग यानी “Misuse” का भी प्रावधान रखा जाए | यहाँ तक की जहां जहां इन क़ानूनों में “Husband” या “Wife” लिखा है वहाँ “Spouse” शब्दों जैसा प्रयोग किया जाए | और गुजरा भत्ता दोनों पक्षों को मिले फिर चाहे पुरुष हो या महिला | वो भी इस तरह के पीड़ित लोगो को मुआवजा सरकार उसी प्रकार दे जिस प्रकार बेरोजगारी भत्ता दे रही है |

3. “शादी के कानून धर्म निरपेक्ष हो - एक देश , एक कानून” :- शादी विवाह के क़ानून एक सामान बनाये जाए | फिर चाहे वो हिन्दू हो या मुस्लिम, सिक्ख हो या इसाईं | हर धर्म के अलग कानून न बनाए जाए | जैसे कि तलाक़ का नया आधार “हिन्दू विवाह संशोधन अधिनियम 2010” सिर्फ हिन्दुओं के लिए ही क्यों? अगर लाना है तो सामान रूप से सारे धर्मों में लाये | इस क़ानून को तो पूर्णतयः असंवैधानिक करार दिया जाना चाहिए |

4. “हिन्दू विवाह संशोधन अधिनियम 2010 को सरकार वापस ले” :- “हिन्दू विवाह संशोधन अधिनियम 2010” यानी हिन्दू विवाह में तलाक़ का नया आधार | इसे सरकार को जल्द से जल्द वापस लेना चाहिए | ये घरेलु हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम से भी खतरनाक है | इससे न सिर्फ हिन्दू परिवार बुरी तरह टूटेंगे , अपितु सामाज में शादी जैसे पवित्र बंधन से लोगों का विश्वास ही उठ जाएगा |

5. “सामाजिक संस्थाए अथवा एक निष्पक्ष जिम्मेदार व्यक्ति की प्रत्येक शादी में नियुक्ति” :- प्रत्येक शादी में एक सामाजिक संस्थान या एक संभ्रांत व्यक्ति की नियुक्ति की जाना अनिवार्य होना चाहिए | दुर्भाग्य वश यदि किसी दांपत्य जीवन में खटास उत्पन्न हो तो इस सामाजिक संस्थान या दोनों के बीच नियुक्त संभ्रांत व्यक्ति की रिपोर्ट अदालत में दाखिल करते हुए मुकदमें का तुरंत निस्तारण करने के दिशा निर्देश जारी होने चाहिए |

6. “बच्चे का माँ और बाप दोनों पर बराबर का हक़” :- बच्चों के उज्जवल भविष्य को ध्यान में रखते हुए , उनके भरण-पोषण की जिम्मेदारी माँ-बाप दोनों को बराबर मिले | एक गैर-सामाजिक संस्थान क्रिस्प (http://www.crisp-india.org ) के अनुसार अमेरिका में किये गए एक शोध में पता चला है कि बच्चे अगर पिता विहीन हो जाते हैं तो उनमे :

* 5 गुना अधिक आत्महत्या की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है |
* 32 गुना अधिक घर से भागने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है |
* 20 गुना अधिक मानसिक उद्दंडता की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है |
* 14 गुना अधिक बलात्कार करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है |
* 9 गुना अधिक स्कूल छोड़ देने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है |
* 10 गुना अधिक नशीले पदार्थों का सेवन करने की प्रवृत्ति उत्पन्न होती है |
* 20 गुना अधिक जेल में पहुँचने के संकेत होते है |

ऐसे बच्चों में एक चौथाई बच्चो को एड्स या STD के संक्रमण होता है| आम तौर पर देखा गया है की बच्चों में सिंगल पेरेंटिंग की तर्ज पर विवादित मामलों में बच्चे को माँ के पास सौप दिया जाता है और पिता अपने बच्चों से मिल भी नहीं पाता | ऐसे में पिता सिर्फ एक “स्पर्म डोनर” बन कर रह जाता है| उपरोक्त बिन्दुओ से साफ़ होता है की पिता की अनुपस्थिति में पले बच्चों के भविष्य खतरनाक ही है| ऐसे में इन बच्चों को माँ-बाप दोनों का सहारा मिले और यदि कोई आपत्ति हो तो किसी ऐसे परिवार को दिया जाए जो संतान विहीन हो और जिनकी गृहस्थी अच्छी चल रही हो किन्तु उन्हें संतान नहीं हो रही|

7. “घरेलु हिंसा से पुरुषों का संरक्षण क़ानून की स्थापना” :- पुरुषों के लिए भी घरेलु हिंसा से निपटने के लिए कानून का गठन होना चाहिए| जिस प्रकार एक महिला के संरक्षण के लिए कानून है उसी प्रकार दुष्ट प्रवत्ति की महिलाओं से निपटने के लिए क़ानून का गठन होना चाहिए | ऐसा नहीं है की सिर्फ महिलाए प्रताड़ित हो रही है बल्कि पुरुष भी प्रताड़ित है | नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के जारी किये गए सिर्फ 2 वर्षों के आंकड़ो से ही इस दर्द की आख्या की जा सकती है|

2012 में 46,992 महिलाओं की तुलना में 88,453 पुरुषों ने आत्महत्या की जबकि
2011 में 47,746 महिलाओं की तुलना में 87,839 पुरुषों ने आत्महत्या की |

इसमें अधिकाँश प्रतिशत विवाहित पुरुषों का ही है |

8. “क़ानून के दुरूपयोग की सख्त सजा महिलाओं को भी मिले” :- क़ानून एक सुरक्षा कवच है | ढाल को तलवार नहीं बनाया जा सकता | इसलिए क़ानून के दुरूपयोग का दंड लिंग भेद रहित हो | पुरुष हो या महिला , किसी को भी , कोई छूट नहीं मिले | यदि कोई दुरूपयोग करता है तो उनको उतनी ही सजा मिले जितनी की वो झूठ के दम पर विपक्षी को दिलाना चाह रहे है | इसमें न्यायपालिका , कार्यपालिका, शाशन एवं प्रशासन के पदाधिकारी भी शामिल हो | वो चाहे फर्जी मुकदमें बढाने वाला वकील हो या झूठी जांच की रिपोर्ट लगाने वाली पुलिस, कोर्ट परिसर का पेशकार हो या चैम्बर के अन्दर फैसला बदलने वाला जज, फर्जी मेडिकल बनाने वाला डॉक्टर हो या आँख बंद कर कानून बदलने वाला क़ानून मंत्री ही क्यों न हो |

9. “तलाक़ के मुकदमों में हर सूरत में 6 महीने या अधिकतम एक साल में निस्तारण” :- “30 की उम्र का है जो खेल , 60 में खेल के होगा क्या” | गैंगस्टर फिल्म के एक गाने में लिखे ये बोल वास्तविक जीवन में भी बहुत महत्व रखते है | सालों साल चले तलाक़ के मुकदमों में फैसला चाहे जो हो साथ रहना तो असंभव हो ही जाता है पुनः नयी जिंदगी बसा पाना भी दूभर हो जाता है | न्यायालयों को चाहिए के तलाक़ के मुकदमें संभ्रांत लोगों के “Undertaking” में तुरंत निस्तारित करें |

10. “गुजारा भत्ता आदि को PRE-NUPTIAL AGREEMENT के तहत तय किया जाए” :- गुजारा भत्ता , संपत्ति का लेखा जोखा ये सब शादी से पहले तय हो जाए | अर्थात किसी कारण वश दंपत्ति को विघटित होना पड़ सकता हो तो वो शादी से पहले ही तय हो जाए की अलग होने की स्थिति में किसे क्या मिलना है | शादी के बाद इस विषय में सालों साल लड़ना कोई कायदेवाद नहीं है | इससे देश के आर्थिक नुक्सान के सिवाय कुछ नहीं होता |

11. “शादी के समय के लेन-देन का पंजीकरण अनिवार्य किया जाए” :- शादी के दौरान जो भी खर्च होता है , उसे पंजीकृत किया जाए | देन लेन को इस बात की मुहर लगाई जाए की वो दान स्वरुप है या दहेज़ स्वरुप , और यदि दहेज़ स्वरुप लेन देन होता है तो शादी को तुरंत खारिज कर दोनों पक्षों में जो उसे दहेज़ में परिभाषित करता है उसे दहेज प्रतिषेध कानून के तहत तुरंत जेल भेजा जाए |

12. “पति-पत्नी के झगड़ों में माँ-बाप/रिश्तेदारों को न शामिल करने के सख्त निर्देश” :- पति-पत्नी के रिश्तों में खटास आने पर पति परिवार को कानूनी दंश से दूर रखा जाए | आम तौर पर देखा गया है की जरा सी समस्या या नोक झोंक में पूरे पति-परिवार को फसा दिया जाता है | इससे न सिर्फ बड़े बुजुर्गो को अनेकों समस्याओं से गुजरना पड़ता है अपितु पति – पत्नी के बीच समझौते की संभावना भी शून्य हो जाती है | रह जाता है तो सिर्फ शोध-प्रतिशोध |

दामन वेलफेयर सोसाइटी (रजि० ) आपसे विनती करती है की जीवन के इन एहम बिन्दुओ पर विचार करते हुए अपने प्रयास के माध्यम से इन बातों को सामाजिक दृष्टिकोण से एवं समाज को विकृत होने से रोकने हेतु जरूरी कदम भी उठाये |

अपनी संस्कृति को ध्यान में रखे और रामायण में कहे इस वाक्य को स्मरण रखे - “इहाँ संभु असमन अनुमाना , दक्ष सुता कहूँ नहीं कल्याणा” | पुरुष प्रधान देश को पुरुष प्रधान न सही पर पुरुष विहीन तो न बनाए और महिला उत्थान के नाम पर देश का पतन न करें |

जय हिन्द | जय भारत | |

आपके आभारी,
अनुपम दुबे
(अध्यक्ष)


दामन वेलफेयर सोसाइटी (रजि० ), कानपुर , उत्तर प्रदेश |
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